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चन्द्रताल

ज़्यादातर जब कभी कहीं किसी किनारे  बैठा दिखता है कोई, सहारे  मौसम उचित लगता है । कभी दिखता नहीं कोई महारथी  बैठा, मुस्कुराता, इठलाता,  दरिया निहारता । दरिया दुख देना दरसाता है? पानी पिछले पाप पूछता है? पहाड़ जब पानी को पसीने सा  गर्मी में गड़ने देता है, नररात्मकता देती नहीं क्या नदी उसे? सोखती है? सहलाती है? साधती है?  संकोच, आत्मा और मन  कुछ तो विचित्र ताक़त है स्थिर बहाओ में  पढ़ा है कहीं, कुछ स्थानीय निवासियों का ये मानना भी है  की ऐसी पवित्र जगहों पर  रात्रि के समय पारियाँ स्नान करने आती है। चंद्रताल

Ship in a Storm

Today I am here with another story. Very apparently it will be a metaphor, but don’t let that stop you from listening. This happens to me a lot: I would be reading something and suddenly—zoop—I am in a hut in Nagaland, scared about militancy around, scared for life. Khair. Dedicated to a brother from my hometown. The story is about a ship. A ship that sails across a river in a distant land. The ship has two people in it, but we don’t focus on them. Why should we? But the ship doesn’t move until we look at them. So what we will do, from time to time, is pay a little attention for continuity. It’s an old ship. The deck has cracks; the side walls look shattered, like it’s been bombed, but it floats nicely. John and Sam are smoking on the deck. The water is freezing—not frozen, it’s still freezing. The ship shouldn’t have been here. It’s only December and the shore is nowhere to be seen. The sail is worried. Worried to the core about being the last one to die, the top to freeze last, to si...

A Bad Poem

It’s weird how, always, I find my way to art or stories, though they weigh heavy. While I stand so, I read— or watched, I should say. Having a Coke with you— with you. It was only a reel, you see, but it reminded me of bygone days. The way I would feel in theatre, the way I would feel in papers, the small, rare moments— those needles in hay. And so, as always on such days, I write a bad poem today, because it feels like poems have betrayed me, art has betrayed me. Though, truth be told, it wasn’t them. But neither did they come back to cheer me up. They only came back reminding me of their warmth. And I hate that. मेरे एक लिखे नाटक का पोस्टर 

अच्छा, बुरा या कुछ और?

 फूल ही बुलाता हूँ मैं उसे  पुष्प नहीं बुलाता  सोचता रहता हूँ , हिंदी में कैसे लिखूँ  तीन ही घर में लोग रहते हैं  मेरे गाँव के पूरब वाले सड़क पर  बाक़ींयों के, या तो कमाने गए हैं, या तो गए थे  अगर आपका अनुमान बिहार नहीं है  ये कविता काफ़ी दिनों तक बची रह गई, खैर स्योंग है  एक चुनता है ग़लत करना, जब चुनना होता है  एक सही चुनता है, फूल के पौधे  हैं उसके क्यारियों में, काफ़ी घने  लेकिन गिनती के 3, पहले वाले के घर पे फूल के पौधे अब निगल जाएँगे  इन तीन को, लगता है देख के  तीसरे घर के सामने मानो ज़मीन बंजर है  जब उस सड़क से गुज़रता था  बचपने में कहता था गाँव का दोस्त मेरा  “लगता नहीं कोई ज़िंदा है इस घर में” देख कर परिवार को बाहर खड़ा |

सफ़ेद गुलाब के काँटे

 सोचो, महाभारत का समय आया  पार्थ ने प्रभु को समझाया  "किसी को कुछ समझ ना आया" क्या बताया? रोशनी का खेल ऐसा  हर ग़लत वस्तु पर छाया। प्रभु बोले, खेल दिखाया  इश्क़ का, कर्तव्य बाध्य, अंग्रेज कैसे आयेंगे।  बोध हो, जब तुम्हें, हर इंसान समान ना होगा  कुछ ख़ज़ाने को विश्वास खोद देंगे  कुछ हथियाई चीज़ से इश्क़ लड़ाएँगे । तब महसूस कर उनको, ज़माने को उन्हें जमाने ना देना, जाने देना, जेम्स बना देना।  पार्थ को शुक्रियाँ प्रभु का, क़र्ज़ होगा, ख़ुशी होगी।  और दर्शकों से माफ़ी होगी, गुज़ारिश होगी, फिर आना ।

दादी की डोली

"68 में आयी थी, 58 साल हो गये कब  ये नहीं मालूम, कितने की थी आयी थी जब " आज फ़ोन की बात उस तरफ़ मुड़ गई  लाल लाल डोली में ,लाली रे  दुल्हनिया    उतने बारसिया पहले, कौनो रे दुल्हनिया  सहवान  खूँट  में  टाँगे  चलते  थे  घोड़े  वाले, दो पहिया एक चालक, एक घोड़ा  बहुत दौड़ा हूँ  मैं उन सड़कों पर  बिना सोचे की 58 साल पहले  दादी मेरी इस गाँव आ रही थी। "18 की होगी और क्या" हम फ़ैसला नहीं कर पाये  कितने की थी दुल्हीन हमारी  मैं सोच पाता  हूँ रह पाता  हूँ  जा पाता  हूँ  कभी कभी उतने पीछे समय में  जब दादी खुश होती है  बुआ के बेटियों के साथ होती है  जब होगी 18 की वो  धूल रास्ते का,  नये जन्मे देश  के जर्जर रोड पे डोली आ रही होगी  सहवान  आज भी मुस्कुराती है, देखा है मैंने  तब भी मुस्कुराती होगी, देख के वो तिराहा, जहां एक रास्ता  राजपुताही टोली, दूसरा ब्राह्मण टोली  के तरफ़, और डोली दाहिने और मुड़ गई होगी।   - Harsh Jh...

पूछना

कहते हैं, पहाड़ों पे चलते उन मुसाफ़िरों को आना, जाना, मगर रुक के देखना ज़रूर उस पथ्थर को, टकरा के जो तुम से हलके से लुढ़क के पहाड़ छोड़ जाते पूछना, तू कहीं परेशान तो नहीं था? 

जंग ढूँढता है

  चले जाना,  कहता हूँ हवाओं से  हवायें कहती हैं तुम तो रुको  घर आना - मैं कहता हूँ  खूबी साफ़ से शबाब से  अनजान अंजाम  से  देखूँ तब  तो रुकूँ ना  देख के,  साख पे, राख से,  लिपटा हुआ मन मेरा  ढूँढ रहा, कोई जंग  मौत हो,  अरमान की, अनजान सी  आत्मा के संग  ढूँढ रहा कोई जंग *२ देह की  अरमानों के  फ़रियाद में  लूट-ता  सारा शहर ढूँढ रहा, कोई जंग  ख़ौफ़ को   मौत के  सीने पे  बनता जीवन का रंग  कहींन  ढूँढ रहा, कोई जंग  ढूँढ रहा, कोई जंग    ज़हर लोग की आग के पीछे  अंधायुग ये अमृत पीके  खोया है शहर में, सहर में   क़हर जंग की आग में जोखें  कुरुक्षेत्र भी शंकित होके  सोया है शहर में, सहर में  एक प्रसिद्ध पेंटिंग 

Peher ( पहर )

शाम हो रही है , कल भी हुई थी , और कल तो कल्पना से परे है।  पर वो परछाई नहीं आयी, पर छाई रही  लालिमा उस याद की। लाल तो केवल रंग है  फिर शाम क्यों सताती है, उजले दिन से ज़्यादा ? कुछ कमी पहले भी थी  रौशनी की, शाम में, और उम्मीद भी  क्या करें, भविष्य भी, अँधेरा ही  रात है , रात थी।  दोपहर ठीक रहता है, बहता है, मेरा छोटा शहर सोता है, याद है? दूसरे पहर की गर्मी? नींद? छटपटाहट? याद है मुझे तो, साथ है! आज भी, नमी बदन की, खुशबु तुम्हारी। दो ठीक है, तीसरे से, चौथे से, अकेले पहले से भी  बुरी है तो, वह सब जो लाल है।  जो हरा है।  जो नीला है, जब परछाई नहीं।  उष्म सूरज की, लाल।  छाया पेड़ो का , हरा।  नीरभ नदियों की , नीला।  दूसरा पहर अच्छा है  परछाई की उम्मीद नहीं होती तो कमी का एहसास कम होता है।   

घर की लड़ाइयां

धिरे धिरे  पता हीं नहीं चला कब से  मैं और मेरे भाईसाहब दोनों  घर से फ़ोन आने पर सोच  तो लेते हैं एकबार की  इसबार  क्या खबर होगी |  ख़बरें दो तरह की होती हैं  ली जाने वाली और  दी जाने वाली |  डरा दोनों देते हैं |  सुबह जब फ़ोन की घंटी बजी  एक परीक्षा की तैयारी कर रहा था  और खबर दी गयी इस बार  सलाह लेने के लिए  ऐसे सब क्षण में लगता है , पैर छोटे हीं रह जाते तो शायद  ऐसी ख़बरें अब भी छुपाई जातीं और  परीक्षा के परिणाम एकमात्र शत्रु होती  दुनिया की मौलिक सच्चाइयां नहीं  जैसे मौत, बीमारी, गरीबी, आक्रोश, और घर की लड़ाइयां ||  - Harsh Jha

छोड़ दो

क्या कहे फूलों को , "  खिलना चोर छोड़ दो "  या कहे खुद को की जहाँ वो है , "टहलना छोड़  दो " |  शाम की उस  लाली को क्या  कहे , "हम नाराज़ है तुमसे "  आभा से अपनी , उनको चिढ़ाना छोड़ दो |  स्याही की खूबी थोड़े है लिखना  कह के तो देखो उसको , "मिटाना छोड़  दो  " |  उन फूलों के रहते हम दुशमनों को कैसे दूतकारे रस्ते में , कोई तो कहो उनसे  ,"सहला के पैरो को मेरे मुझे  पुचकारना छोड़  दे " | आजकल लोगो के जुबां में लस वो कहाँ , वरना एक हुंकार और स्वीकार था , "जीना छोड़  दो" | कहाँ फूल , कहाँ  खुशियाँ , कहाँ जीवन में एक भी पल उन्माद के , जो भी हो कुर्शी पे सर , हाथ में चाबुक , और जुबां पे है , "जीना है तो जीना छोड़  दो " |

समां-ऐ-पुराने

आजकल की फिज़ाओ में वो महक , धीमी सी कहाँ |  मुंध कर आँखों  को चूमें वो सिद्दत , होठो में कहाँ |   साँझ पहर की लालिमा को  छाने , जो पत्ती से , वो पेड़ है कहाँ |  चमड़े के चोट को भरदे वो , पावन  मिटटी है कहाँ |  गर्म रत की वो रहत , पुरबा हवा , की वो खुसबू है कहाँ |  माँ के आंचल तले जीवन गुजार दे, वो बच्चो की मस्त टोली है कहाँ |  ढूंढ के इनको ऐ धरती तू , मुझको बता दे ; मेरे दिल की चाहत है जाने की  वहाँ ||                            

कुछ खोने लगा है !

खूबसूरत वो दिन ,         गगन निखरा सा बादलों के बिन ,         हवाओं में जोश था । वह दिन खुला सा         खगों में नादान रोष था ।। जन गण मन , उठ रही थी ध्वनि हर  एक  लव  उस पल की बनी देश  एक है , आजाद है , रहेगा ! उम्मीद आशा और हिम्मत की धनि ठिठोली मां की ममता सी , जन्म भूमि के एहसानों की ।। छोटे से सर को धूप की किरणों से ना बचाए तिरंगे को इठलाता इतराता देख , देश की शान पर मुस्कुराए ।। रोज हर इसी भातीं दिनकर का स्वागत कर माटी को पूजता मां की गोद में आधी अधूरी बात पर पूछता " मां मैं तिरंगे में लिपटना चाहता हूं ,उसे चूमना चाहता हूं ,उसे लहराना चाहता हूं " ; मां का प्यार उमड़ आता उसे चूमती सहलाकर वो रीझ जाता । रात वह अलग थी आज,         अंधेरे में एक मनहूसियत थी । कोई आ रहा था छुपाए ,         एक घिनौना राज ।। नाव से छहः लोग उतरे थे । न डर , न खौफ, न  सहमे थे । योवन की पहली सीढी भी खाली थी ,         जीवन की अंतिम...

पृथ्वी और मेरा हृदय

जब हवा साईं साईं बहती है पृथ्वी और मेरा हृदय स्तब्ध रहे आते हैं कुछ देर बाद फिर बात शुरू होती है आंखों में धूल की सीपियां बजती हैं दूर तू मेरे पास खड़ी है बता मैं अपने प्रेम क...

मूल अधिकार

क्या कहा -चुनाव आ रहे हैं तो खड़े हो जाइए देश जो थोड़ा बहुत बचा है उसे आप खा जाइए ! देखिए ना लोग किस तरह खा रहे हैं सड़कें, पुल तथा फैक्ट्रियां तक पचा रहे हैं जब भी डकार लेते हैं चुनाव हो जाता है और बेचारा आदमी नेताओं की भीड़ में खो जाता है संविधान की धाराओं को स्वार्थ गटर में मिलाने का हर प्रयास जारी है खुशबू के तिस्करों पर चमन की जिम्मेदारी है सबको अपनी-अपनी पड़ी है हर काली तस्वीर सुनहरे फ्रेम में जड़ी है सारे काम अपने आप हो रहे हैं जिसकी --- में गवाह है उसके सारे खून माफ हो रहे हैं इंसानियत मर रही है और राजनीति सभ्यता के सफेद कैनवास पर आदमी के खून से हस्ताक्षर कर रही है मूल अधिकार ? बस वोट देना है सो दे जाओ और गंगाजल के देश में जहर पिया जाओ ।

नहीं आती

डाक अब वक्त पर नहीं आती , प्रेयसी  की खबर नहीं आती । पहले आती थी चुटकुलों पर हंसी , अब किसी बात पर नहीं आती । हमने चाहा की मौत आ जाए , मौत बोली कि मर ! नहीं आती  हम शराफत में कुछ नहीं क...

लश्कर ए हिंद

जान प्राण अदाओं पर आन बान की रक्षा से । स्वीकार है वह मौत भी जो देश की हो शान में। हिंद की सेना आज नहीं , यह बिल्कुल है इतिहास का ; लाशों को कागज बनाकर स्याही अपने खूनों को। 99 की य...

सस्ते टिकाऊ जूते

जैसे ही हमें यह पता चला कि गांधी-चौक वाली दुकान पर बहुत सस्ते जूते मिल रहे हैं जो सस्ते होते हुए भी बहुत दिनों तक चलते हैं मैं दौड़ा हुआ उस जूते की दुकान पर आया और दुकानदार से ...

बेटियां

क्या कहूं कि वो परियों का रुप होती है | या कड़कड़ाती ठंड में सुहानी धूप होती है|| चिड़ियों की चहचहाहट की तरह | या निश्चल खिलखिलाहट||  वह होती हैं उदासी की हर मर्ज की दवा की तरह|  या उमस में शीतल हवा की तरह || चिड़ियों की चहचहाहट है | या निश्छल खिलखिलाहट है | वह आंगन में फैला उजाला है || या शायद गुस्से पर लगा ताला है | पहाड़ की च*** पर सुबह की किरण है || या जो जिंदगी जीने का सही आचरण है| वह ताकत जो छोटे से घर को, महल कर द |  या जो काफिया जो ग़ज़ल को मुकम्मल कर द* || अक्षर जो ना हो तो वर्णमाला अधूरी है || वह जो सबसे ज्यादा जरूरी है||  यह नहीं कहूंगा कि वह हर वक्त सांस सांस होती है||   बेटियां तो सिर्फ एहसास होती है |||||| उसकी आंखें न किसी पिता से गुड़िया मांगती है ना खिलौना ||| कब आओगे बस एक छोटा सा सवाल सलोना | |जल्दी आऊंगा अपनी मजबूरी को छुपाते हुए वह देता है जवाब ||| तारीख बताओ टाइम बताओ उंगलियों पर करने लगती है हिसाब ||| और जब वह पिता नहीं द* पाता सही सही जवाब || अपने आंसुओं को छिपाने के लिए चेहरे पर रख लेती है किताब ||| ऑस्ट्रेलि...

Hello

Harsh here! Thanks for dropping by, name of the blog is white hedwig, cause we like hedwig. We actually love hedwig. <3 Do comment what you think.