जान प्राण अदाओं पर
आन बान की रक्षा से ।
स्वीकार है वह मौत भी
जो देश की हो शान में।
हिंद की सेना आज नहीं ,
यह बिल्कुल है इतिहास का ;
लाशों को कागज बनाकर
स्याही अपने खूनों को।
99 की याद हो या
1971 का वह जज्बा ,
लश्कर ए हिंद की गाथाओं से लबरेज पूरे भारत की कुल खूनों में उबाल है ।
डोकलाम में तुमने देखा पूरा का पूरा किस्सा
हम वह सेना नहीं रहे ,
याद करो और उल्टो पन्नौ को
जब हम 71 में नहीं सहे ।
देश की मिट्टी चूमते जब वे घर से निकले थे , जानते थे मौत को भी जिंदगी से अवगत थे फिर भी देश के लिए हां
वह मर मिटने को तैयार थे ।।
वह लोग गद्दार कहीं के ,
मरते मरते आए थे ।
सीने में वे नर्क छिपाए ,
देश जलाने आए थे ।
दिल मेरा तो जल जाता है ;
ऐसे ऐसे दृश्य से ।
माता से ही शर्ाप ले गए,
उनके नाजुक लव्जों से ।
जाने दो इनको ,लेना
इनका क्या शेष रह गया ।
मौत से इनको मिलवाकर ,
पता चला कृपा हो गया ।
मरने दो इनको ,जीते जी
मौत पर इन का अधिकार नहीं ।
कैसे जाने दूं मैं इनको जहां हमारे दोस्त कईं ।।
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