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Showing posts from 2024

सफ़ेद गुलाब के काँटे

 सोचो, महाभारत का समय आया  पार्थ ने प्रभु को समझाया  "किसी को कुछ समझ ना आया" क्या बताया? रोशनी का खेल ऐसा  हर ग़लत वस्तु पर छाया। प्रभु बोले, खेल दिखाया  इश्क़ का, कर्तव्य बाध्य, अंग्रेज कैसे आयेंगे।  बोध हो, जब तुम्हें, हर इंसान समान ना होगा  कुछ ख़ज़ाने को विश्वास खोद देंगे  कुछ हथियाई चीज़ से इश्क़ लड़ाएँगे । तब महसूस कर उनको, ज़माने को उन्हें जमाने ना देना, जाने देना, जेम्स बना देना।  पार्थ को शुक्रियाँ प्रभु का, क़र्ज़ होगा, ख़ुशी होगी।  और दर्शकों से माफ़ी होगी, गुज़ारिश होगी, फिर आना ।

दादी की डोली

"68 में आयी थी, 58 साल हो गये कब  ये नहीं मालूम, कितने की थी आयी थी जब " आज फ़ोन की बात उस तरफ़ मुड़ गई  लाल लाल डोली में ,लाली रे  दुल्हनिया    उतने बारसिया पहले, कौनो रे दुल्हनिया  सहवान  खूँट  में  टाँगे  चलते  थे  घोड़े  वाले, दो पहिया एक चालक, एक घोड़ा  बहुत दौड़ा हूँ  मैं उन सड़कों पर  बिना सोचे की 58 साल पहले  दादी मेरी इस गाँव आ रही थी। "18 की होगी और क्या" हम फ़ैसला नहीं कर पाये  कितने की थी दुल्हीन हमारी  मैं सोच पाता  हूँ रह पाता  हूँ  जा पाता  हूँ  कभी कभी उतने पीछे समय में  जब दादी खुश होती है  बुआ के बेटियों के साथ होती है  जब होगी 18 की वो  धूल रास्ते का,  नये जन्मे देश  के जर्जर रोड पे डोली आ रही होगी  सहवान  आज भी मुस्कुराती है, देखा है मैंने  तब भी मुस्कुराती होगी, देख के वो तिराहा, जहां एक रास्ता  राजपुताही टोली, दूसरा ब्राह्मण टोली  के तरफ़, और डोली दाहिने और मुड़ गई होगी।   - Harsh Jh...

पूछना

कहते हैं, पहाड़ों पे चलते उन मुसाफ़िरों को आना, जाना, मगर रुक के देखना ज़रूर उस पथ्थर को, टकरा के जो तुम से हलके से लुढ़क के पहाड़ छोड़ जाते पूछना, तू कहीं परेशान तो नहीं था? 

जंग ढूँढता है

  चले जाना,  कहता हूँ हवाओं से  हवायें कहती हैं तुम तो रुको  घर आना - मैं कहता हूँ  खूबी साफ़ से शबाब से  अनजान अंजाम  से  देखूँ तब  तो रुकूँ ना  देख के,  साख पे, राख से,  लिपटा हुआ मन मेरा  ढूँढ रहा, कोई जंग  मौत हो,  अरमान की, अनजान सी  आत्मा के संग  ढूँढ रहा कोई जंग *२ देह की  अरमानों के  फ़रियाद में  लूट-ता  सारा शहर ढूँढ रहा, कोई जंग  ख़ौफ़ को   मौत के  सीने पे  बनता जीवन का रंग  कहींन  ढूँढ रहा, कोई जंग  ढूँढ रहा, कोई जंग    ज़हर लोग की आग के पीछे  अंधायुग ये अमृत पीके  खोया है शहर में, सहर में   क़हर जंग की आग में जोखें  कुरुक्षेत्र भी शंकित होके  सोया है शहर में, सहर में  एक प्रसिद्ध पेंटिंग