क्या कहे फूलों को , " खिलना चोर छोड़ दो " या कहे खुद को की जहाँ वो है , "टहलना छोड़ दो " | शाम की उस लाली को क्या कहे , "हम नाराज़ है तुमसे " आभा से अपनी , उनको चिढ़ाना छोड़ दो | स्याही की खूबी थोड़े है लिखना कह के तो देखो उसको , "मिटाना छोड़ दो " | उन फूलों के रहते हम दुशमनों को कैसे दूतकारे रस्ते में , कोई तो कहो उनसे ,"सहला के पैरो को मेरे मुझे पुचकारना छोड़ दे " | आजकल लोगो के जुबां में लस वो कहाँ , वरना एक हुंकार और स्वीकार था , "जीना छोड़ दो" | कहाँ फूल , कहाँ खुशियाँ , कहाँ जीवन में एक भी पल उन्माद के , जो भी हो कुर्शी पे सर , हाथ में चाबुक , और जुबां पे है , "जीना है तो जीना छोड़ दो " |
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