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Showing posts from June, 2018

छोड़ दो

क्या कहे फूलों को , "  खिलना चोर छोड़ दो "  या कहे खुद को की जहाँ वो है , "टहलना छोड़  दो " |  शाम की उस  लाली को क्या  कहे , "हम नाराज़ है तुमसे "  आभा से अपनी , उनको चिढ़ाना छोड़ दो |  स्याही की खूबी थोड़े है लिखना  कह के तो देखो उसको , "मिटाना छोड़  दो  " |  उन फूलों के रहते हम दुशमनों को कैसे दूतकारे रस्ते में , कोई तो कहो उनसे  ,"सहला के पैरो को मेरे मुझे  पुचकारना छोड़  दे " | आजकल लोगो के जुबां में लस वो कहाँ , वरना एक हुंकार और स्वीकार था , "जीना छोड़  दो" | कहाँ फूल , कहाँ  खुशियाँ , कहाँ जीवन में एक भी पल उन्माद के , जो भी हो कुर्शी पे सर , हाथ में चाबुक , और जुबां पे है , "जीना है तो जीना छोड़  दो " |