"68 में आयी थी, 58 साल हो गये कब ये नहीं मालूम, कितने की थी आयी थी जब " आज फ़ोन की बात उस तरफ़ मुड़ गई लाल लाल डोली में ,लाली रे दुल्हनिया उतने बारसिया पहले, कौनो रे दुल्हनिया सहवान खूँट में टाँगे चलते थे घोड़े वाले, दो पहिया एक चालक, एक घोड़ा बहुत दौड़ा हूँ मैं उन सड़कों पर बिना सोचे की 58 साल पहले दादी मेरी इस गाँव आ रही थी। "18 की होगी और क्या" हम फ़ैसला नहीं कर पाये कितने की थी दुल्हीन हमारी मैं सोच पाता हूँ रह पाता हूँ जा पाता हूँ कभी कभी उतने पीछे समय में जब दादी खुश होती है बुआ के बेटियों के साथ होती है जब होगी 18 की वो धूल रास्ते का, नये जन्मे देश के जर्जर रोड पे डोली आ रही होगी सहवान आज भी मुस्कुराती है, देखा है मैंने तब भी मुस्कुराती होगी, देख के वो तिराहा, जहां एक रास्ता राजपुताही टोली, दूसरा ब्राह्मण टोली के तरफ़, और डोली दाहिने और मुड़ गई होगी। - Harsh Jh...
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