खूबसूरत वो दिन , गगन निखरा सा बादलों के बिन , हवाओं में जोश था । वह दिन खुला सा खगों में नादान रोष था ।। जन गण मन , उठ रही थी ध्वनि हर एक लव उस पल की बनी देश एक है , आजाद है , रहेगा ! उम्मीद आशा और हिम्मत की धनि ठिठोली मां की ममता सी , जन्म भूमि के एहसानों की ।। छोटे से सर को धूप की किरणों से ना बचाए तिरंगे को इठलाता इतराता देख , देश की शान पर मुस्कुराए ।। रोज हर इसी भातीं दिनकर का स्वागत कर माटी को पूजता मां की गोद में आधी अधूरी बात पर पूछता " मां मैं तिरंगे में लिपटना चाहता हूं ,उसे चूमना चाहता हूं ,उसे लहराना चाहता हूं " ; मां का प्यार उमड़ आता उसे चूमती सहलाकर वो रीझ जाता । रात वह अलग थी आज, अंधेरे में एक मनहूसियत थी । कोई आ रहा था छुपाए , एक घिनौना राज ।। नाव से छहः लोग उतरे थे । न डर , न खौफ, न सहमे थे । योवन की पहली सीढी भी खाली थी , जीवन की अंतिम...
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