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Showing posts with the label व्यंग ( Parody)

कुछ खोने लगा है !

खूबसूरत वो दिन ,         गगन निखरा सा बादलों के बिन ,         हवाओं में जोश था । वह दिन खुला सा         खगों में नादान रोष था ।। जन गण मन , उठ रही थी ध्वनि हर  एक  लव  उस पल की बनी देश  एक है , आजाद है , रहेगा ! उम्मीद आशा और हिम्मत की धनि ठिठोली मां की ममता सी , जन्म भूमि के एहसानों की ।। छोटे से सर को धूप की किरणों से ना बचाए तिरंगे को इठलाता इतराता देख , देश की शान पर मुस्कुराए ।। रोज हर इसी भातीं दिनकर का स्वागत कर माटी को पूजता मां की गोद में आधी अधूरी बात पर पूछता " मां मैं तिरंगे में लिपटना चाहता हूं ,उसे चूमना चाहता हूं ,उसे लहराना चाहता हूं " ; मां का प्यार उमड़ आता उसे चूमती सहलाकर वो रीझ जाता । रात वह अलग थी आज,         अंधेरे में एक मनहूसियत थी । कोई आ रहा था छुपाए ,         एक घिनौना राज ।। नाव से छहः लोग उतरे थे । न डर , न खौफ, न  सहमे थे । योवन की पहली सीढी भी खाली थी ,         जीवन की अंतिम...

मूल अधिकार

क्या कहा -चुनाव आ रहे हैं तो खड़े हो जाइए देश जो थोड़ा बहुत बचा है उसे आप खा जाइए ! देखिए ना लोग किस तरह खा रहे हैं सड़कें, पुल तथा फैक्ट्रियां तक पचा रहे हैं जब भी डकार लेते हैं चुनाव हो जाता है और बेचारा आदमी नेताओं की भीड़ में खो जाता है संविधान की धाराओं को स्वार्थ गटर में मिलाने का हर प्रयास जारी है खुशबू के तिस्करों पर चमन की जिम्मेदारी है सबको अपनी-अपनी पड़ी है हर काली तस्वीर सुनहरे फ्रेम में जड़ी है सारे काम अपने आप हो रहे हैं जिसकी --- में गवाह है उसके सारे खून माफ हो रहे हैं इंसानियत मर रही है और राजनीति सभ्यता के सफेद कैनवास पर आदमी के खून से हस्ताक्षर कर रही है मूल अधिकार ? बस वोट देना है सो दे जाओ और गंगाजल के देश में जहर पिया जाओ ।

नहीं आती

डाक अब वक्त पर नहीं आती , प्रेयसी  की खबर नहीं आती । पहले आती थी चुटकुलों पर हंसी , अब किसी बात पर नहीं आती । हमने चाहा की मौत आ जाए , मौत बोली कि मर ! नहीं आती  हम शराफत में कुछ नहीं क...