क्या कहा -चुनाव आ रहे हैं
तो खड़े हो जाइए
देश जो थोड़ा बहुत बचा है
उसे आप खा जाइए !
देखिए ना
लोग किस तरह खा रहे हैं
सड़कें, पुल तथा फैक्ट्रियां तक
पचा रहे हैं
जब भी डकार लेते हैं
चुनाव हो जाता है
और बेचारा आदमी
नेताओं की भीड़ में खो जाता है
संविधान की धाराओं को
स्वार्थ गटर में
मिलाने का
हर प्रयास जारी है
खुशबू के तिस्करों पर
चमन की जिम्मेदारी है
सबको अपनी-अपनी पड़ी है
हर काली तस्वीर
सुनहरे फ्रेम में जड़ी है
सारे काम अपने आप हो रहे हैं
जिसकी --- में गवाह है
उसके सारे खून माफ हो रहे हैं
इंसानियत मर रही है
और राजनीति
सभ्यता के सफेद कैनवास पर
आदमी के खून से
हस्ताक्षर कर रही है
मूल अधिकार ?
बस वोट देना है
सो दे जाओ
और गंगाजल के देश में
जहर पिया जाओ ।
ज़्यादातर जब कभी कहीं किसी किनारे बैठा दिखता है कोई, सहारे मौसम उचित लगता है । कभी दिखता नहीं कोई महारथी बैठा, मुस्कुराता, इठलाता, दरिया निहारता । दरिया दुख देना दरसाता है? पानी पिछले पाप पूछता है? पहाड़ जब पानी को पसीने सा गर्मी में गड़ने देता है, नररात्मकता देती नहीं क्या नदी उसे? सोखती है? सहलाती है? साधती है? संकोच, आत्मा और मन कुछ तो विचित्र ताक़त है स्थिर बहाओ में पढ़ा है कहीं, कुछ स्थानीय निवासियों का ये मानना भी है की ऐसी पवित्र जगहों पर रात्रि के समय पारियाँ स्नान करने आती है। चंद्रताल
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