ज़्यादातर जब कभी कहीं किसी किनारे बैठा दिखता है कोई, सहारे मौसम उचित लगता है । कभी दिखता नहीं कोई महारथी बैठा, मुस्कुराता, इठलाता, दरिया निहारता । दरिया दुख देना दरसाता है? पानी पिछले पाप पूछता है? पहाड़ जब पानी को पसीने सा गर्मी में गड़ने देता है, नररात्मकता देती नहीं क्या नदी उसे? सोखती है? सहलाती है? साधती है? संकोच, आत्मा और मन कुछ तो विचित्र ताक़त है स्थिर बहाओ में पढ़ा है कहीं, कुछ स्थानीय निवासियों का ये मानना भी है की ऐसी पवित्र जगहों पर रात्रि के समय पारियाँ स्नान करने आती है। चंद्रताल
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