धिरे धिरे पता हीं नहीं चला कब से मैं और मेरे भाईसाहब दोनों घर से फ़ोन आने पर सोच तो लेते हैं एकबार की इसबार क्या खबर होगी | ख़बरें दो तरह की होती हैं ली जाने वाली और दी जाने वाली | डरा दोनों देते हैं | सुबह जब फ़ोन की घंटी बजी एक परीक्षा की तैयारी कर रहा था और खबर दी गयी इस बार सलाह लेने के लिए ऐसे सब क्षण में लगता है , पैर छोटे हीं रह जाते तो शायद ऐसी ख़बरें अब भी छुपाई जातीं और परीक्षा के परिणाम एकमात्र शत्रु होती दुनिया की मौलिक सच्चाइयां नहीं जैसे मौत, बीमारी, गरीबी, आक्रोश, और घर की लड़ाइयां || - Harsh Jha
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