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Showing posts from September, 2023

घर की लड़ाइयां

धिरे धिरे  पता हीं नहीं चला कब से  मैं और मेरे भाईसाहब दोनों  घर से फ़ोन आने पर सोच  तो लेते हैं एकबार की  इसबार  क्या खबर होगी |  ख़बरें दो तरह की होती हैं  ली जाने वाली और  दी जाने वाली |  डरा दोनों देते हैं |  सुबह जब फ़ोन की घंटी बजी  एक परीक्षा की तैयारी कर रहा था  और खबर दी गयी इस बार  सलाह लेने के लिए  ऐसे सब क्षण में लगता है , पैर छोटे हीं रह जाते तो शायद  ऐसी ख़बरें अब भी छुपाई जातीं और  परीक्षा के परिणाम एकमात्र शत्रु होती  दुनिया की मौलिक सच्चाइयां नहीं  जैसे मौत, बीमारी, गरीबी, आक्रोश, और घर की लड़ाइयां ||  - Harsh Jha