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Showing posts from May, 2018

समां-ऐ-पुराने

आजकल की फिज़ाओ में वो महक , धीमी सी कहाँ |  मुंध कर आँखों  को चूमें वो सिद्दत , होठो में कहाँ |   साँझ पहर की लालिमा को  छाने , जो पत्ती से , वो पेड़ है कहाँ |  चमड़े के चोट को भरदे वो , पावन  मिटटी है कहाँ |  गर्म रत की वो रहत , पुरबा हवा , की वो खुसबू है कहाँ |  माँ के आंचल तले जीवन गुजार दे, वो बच्चो की मस्त टोली है कहाँ |  ढूंढ के इनको ऐ धरती तू , मुझको बता दे ; मेरे दिल की चाहत है जाने की  वहाँ ||