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Showing posts from January, 2024

पूछना

कहते हैं, पहाड़ों पे चलते उन मुसाफ़िरों को आना, जाना, मगर रुक के देखना ज़रूर उस पथ्थर को, टकरा के जो तुम से हलके से लुढ़क के पहाड़ छोड़ जाते पूछना, तू कहीं परेशान तो नहीं था? 

जंग ढूँढता है

  चले जाना,  कहता हूँ हवाओं से  हवायें कहती हैं तुम तो रुको  घर आना - मैं कहता हूँ  खूबी साफ़ से शबाब से  अनजान अंजाम  से  देखूँ तब  तो रुकूँ ना  देख के,  साख पे, राख से,  लिपटा हुआ मन मेरा  ढूँढ रहा, कोई जंग  मौत हो,  अरमान की, अनजान सी  आत्मा के संग  ढूँढ रहा कोई जंग *२ देह की  अरमानों के  फ़रियाद में  लूट-ता  सारा शहर ढूँढ रहा, कोई जंग  ख़ौफ़ को   मौत के  सीने पे  बनता जीवन का रंग  कहींन  ढूँढ रहा, कोई जंग  ढूँढ रहा, कोई जंग    ज़हर लोग की आग के पीछे  अंधायुग ये अमृत पीके  खोया है शहर में, सहर में   क़हर जंग की आग में जोखें  कुरुक्षेत्र भी शंकित होके  सोया है शहर में, सहर में  एक प्रसिद्ध पेंटिंग