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समां-ऐ-पुराने

आजकल की फिज़ाओ में वो महक , धीमी सी कहाँ |  मुंध कर आँखों  को चूमें वो सिद्दत , होठो में कहाँ |   साँझ पहर की लालिमा को  छाने , जो पत्ती से , वो पेड़ है कहाँ |  चमड़े के चोट को भरदे वो , पावन  मिटटी है कहाँ |  गर्म रत की वो रहत , पुरबा हवा , की वो खुसबू है कहाँ |  माँ के आंचल तले जीवन गुजार दे, वो बच्चो की मस्त टोली है कहाँ |  ढूंढ के इनको ऐ धरती तू , मुझको बता दे ; मेरे दिल की चाहत है जाने की  वहाँ ||                            

कुछ खोने लगा है !

खूबसूरत वो दिन ,         गगन निखरा सा बादलों के बिन ,         हवाओं में जोश था । वह दिन खुला सा         खगों में नादान रोष था ।। जन गण मन , उठ रही थी ध्वनि हर  एक  लव  उस पल की बनी देश  एक है , आजाद है , रहेगा ! उम्मीद आशा और हिम्मत की धनि ठिठोली मां की ममता सी , जन्म भूमि के एहसानों की ।। छोटे से सर को धूप की किरणों से ना बचाए तिरंगे को इठलाता इतराता देख , देश की शान पर मुस्कुराए ।। रोज हर इसी भातीं दिनकर का स्वागत कर माटी को पूजता मां की गोद में आधी अधूरी बात पर पूछता " मां मैं तिरंगे में लिपटना चाहता हूं ,उसे चूमना चाहता हूं ,उसे लहराना चाहता हूं " ; मां का प्यार उमड़ आता उसे चूमती सहलाकर वो रीझ जाता । रात वह अलग थी आज,         अंधेरे में एक मनहूसियत थी । कोई आ रहा था छुपाए ,         एक घिनौना राज ।। नाव से छहः लोग उतरे थे । न डर , न खौफ, न  सहमे थे । योवन की पहली सीढी भी खाली थी ,         जीवन की अंतिम...

पृथ्वी और मेरा हृदय

जब हवा साईं साईं बहती है पृथ्वी और मेरा हृदय स्तब्ध रहे आते हैं कुछ देर बाद फिर बात शुरू होती है आंखों में धूल की सीपियां बजती हैं दूर तू मेरे पास खड़ी है बता मैं अपने प्रेम क...