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Peher ( पहर )

शाम हो रही है , कल भी हुई थी , और कल तो कल्पना से परे है।  पर वो परछाई नहीं आयी, पर छाई रही  लालिमा उस याद की। लाल तो केवल रंग है  फिर शाम क्यों सताती है, उजले दिन से ज़्यादा ? कुछ कमी पहले भी थी  रौशनी की, शाम में, और उम्मीद भी  क्या करें, भविष्य भी, अँधेरा ही  रात है , रात थी।  दोपहर ठीक रहता है, बहता है, मेरा छोटा शहर सोता है, याद है? दूसरे पहर की गर्मी? नींद? छटपटाहट? याद है मुझे तो, साथ है! आज भी, नमी बदन की, खुशबु तुम्हारी। दो ठीक है, तीसरे से, चौथे से, अकेले पहले से भी  बुरी है तो, वह सब जो लाल है।  जो हरा है।  जो नीला है, जब परछाई नहीं।  उष्म सूरज की, लाल।  छाया पेड़ो का , हरा।  नीरभ नदियों की , नीला।  दूसरा पहर अच्छा है  परछाई की उम्मीद नहीं होती तो कमी का एहसास कम होता है।   

घर की लड़ाइयां

धिरे धिरे  पता हीं नहीं चला कब से  मैं और मेरे भाईसाहब दोनों  घर से फ़ोन आने पर सोच  तो लेते हैं एकबार की  इसबार  क्या खबर होगी |  ख़बरें दो तरह की होती हैं  ली जाने वाली और  दी जाने वाली |  डरा दोनों देते हैं |  सुबह जब फ़ोन की घंटी बजी  एक परीक्षा की तैयारी कर रहा था  और खबर दी गयी इस बार  सलाह लेने के लिए  ऐसे सब क्षण में लगता है , पैर छोटे हीं रह जाते तो शायद  ऐसी ख़बरें अब भी छुपाई जातीं और  परीक्षा के परिणाम एकमात्र शत्रु होती  दुनिया की मौलिक सच्चाइयां नहीं  जैसे मौत, बीमारी, गरीबी, आक्रोश, और घर की लड़ाइयां ||  - Harsh Jha

छोड़ दो

क्या कहे फूलों को , "  खिलना चोर छोड़ दो "  या कहे खुद को की जहाँ वो है , "टहलना छोड़  दो " |  शाम की उस  लाली को क्या  कहे , "हम नाराज़ है तुमसे "  आभा से अपनी , उनको चिढ़ाना छोड़ दो |  स्याही की खूबी थोड़े है लिखना  कह के तो देखो उसको , "मिटाना छोड़  दो  " |  उन फूलों के रहते हम दुशमनों को कैसे दूतकारे रस्ते में , कोई तो कहो उनसे  ,"सहला के पैरो को मेरे मुझे  पुचकारना छोड़  दे " | आजकल लोगो के जुबां में लस वो कहाँ , वरना एक हुंकार और स्वीकार था , "जीना छोड़  दो" | कहाँ फूल , कहाँ  खुशियाँ , कहाँ जीवन में एक भी पल उन्माद के , जो भी हो कुर्शी पे सर , हाथ में चाबुक , और जुबां पे है , "जीना है तो जीना छोड़  दो " |