शाम हो रही है , कल भी हुई थी , और कल तो कल्पना से परे है। पर वो परछाई नहीं आयी, पर छाई रही लालिमा उस याद की। लाल तो केवल रंग है फिर शाम क्यों सताती है, उजले दिन से ज़्यादा ? कुछ कमी पहले भी थी रौशनी की, शाम में, और उम्मीद भी क्या करें, भविष्य भी, अँधेरा ही रात है , रात थी। दोपहर ठीक रहता है, बहता है, मेरा छोटा शहर सोता है, याद है? दूसरे पहर की गर्मी? नींद? छटपटाहट? याद है मुझे तो, साथ है! आज भी, नमी बदन की, खुशबु तुम्हारी। दो ठीक है, तीसरे से, चौथे से, अकेले पहले से भी बुरी है तो, वह सब जो लाल है। जो हरा है। जो नीला है, जब परछाई नहीं। उष्म सूरज की, लाल। छाया पेड़ो का , हरा। नीरभ नदियों की , नीला। दूसरा पहर अच्छा है परछाई की उम्मीद नहीं होती तो कमी का एहसास कम होता है।
Stories | Poetry | Theatre | Films